नवरात्रि के पावन पर्व का तीसरा दिन माँ दुर्गा के तीसरे स्वरूप माँ चंद्रघंटा (Maa Chandraghanta) को समर्पित है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माँ चंद्रघंटा की पूजा करने से भक्तों को साहस, वीरता, और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है। Listen on youtube https://youtu.be/-C-M1M4VT3o?si=rHEdC6zlXFfuSc3f or continue reading below
1. माँ चंद्रघंटा का स्वरूप
माँ चंद्रघंटा का रूप अत्यंत शांत, दिव्य और कल्याणकारी है।
- मस्तक पर चंद्र: इनके मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्रमा (अर्धचंद्र) सुशोभित है, इसी कारण इन्हें ‘चंद्रघंटा’ कहा जाता है।
- सवारी: माता रानी स्वर्ण के समान कांतिवान हैं और सिंह (शेर) पर सवार हैं।
- अस्त्र-शस्त्र: माँ की 10 भुजाएँ हैं, जिनमें त्रिशूल, गदा, तलवार, कमंडल, धनुष, बाण, और कमल पुष्प धारण किए हुए हैं।
2. माँ चंद्रघंटा की व्रत कथा (Vrat Katha)
कथा उस समय की है जब देवी पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। लंबे समय तक तप करने के बाद भगवान शिव ने उनकी भक्ति को स्वीकार किया और दोनों का विवाह निश्चित हुआ।जब विवाह का समय आया, तो भगवान शिव अपनी अनोखी बारात लेकर देवी पार्वती के घर पहुँचे। भगवान शिव के साथ उनके गण, योगी, साधु और अनेक विचित्र रूप वाले प्राणी भी थे। स्वयं भगवान शिव का स्वरूप भी उस समय ऐसा था कि जिसने भी देखा, वह आश्चर्यचकित रह गया।उनके शरीर पर भस्म लगी थी। गले में सर्प सुशोभित था। जटाओं में चंद्रमा विराजमान था और उनके साथ ऐसे गण थे जिन्हें देखकर सामान्य मनुष्य भयभीत हो सकता था।जब पार्वती के परिवार और नगरवासियों ने शिवजी की बारात देखी, तो बहुत से लोग घबरा गए। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि इतनी विचित्र बारात के साथ विवाह कैसे होगा। माता पार्वती के परिवार के मन में भी चिंता उत्पन्न होने लगी।तब माता पार्वती ने समझा कि उनके प्रिय भगवान शिव का यह स्वरूप उनके परिवार के लिए भय का कारण बन रहा है। माता ने अपने भीतर की दिव्य शक्ति को जागृत किया और एक अत्यंत तेजस्वी रूप धारण किया।उनका यह स्वरूप अद्भुत था।माँ के मस्तक पर अर्धचंद्र के समान घंटा सुशोभित था। उनके चेहरे पर दिव्य तेज था। उनके अनेक हाथों में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र शोभायमान थे। माँ सिंह पर विराजमान थीं और उनका स्वरूप एक साथ करुणा, शांति, साहस और शक्ति का प्रतीक था।यही दिव्य स्वरूप माँ चंद्रघंटा के नाम से प्रसिद्ध हुआ।माँ ने अपने दिव्य रूप से सभी को यह संदेश दिया कि सच्ची शक्ति वही है जो भय को समाप्त करके शांति स्थापित करे। माँ ने अपने परिवार और भक्तों को आश्वस्त किया कि भगवान शिव का स्वरूप भले ही संसार से अलग दिखाई देता हो, लेकिन उनके हृदय में अपार करुणा और प्रेम है।माँ चंद्रघंटा की कृपा से वातावरण में व्याप्त भय समाप्त हुआ और भगवान शिव तथा माता पार्वती का विवाह मंगलमय रूप से संपन्न हुआ।लेकिन माँ चंद्रघंटा की महिमा केवल विवाह की इस कथा तक सीमित नहीं है।मान्यता है कि जब संसार में आसुरी शक्तियों का अत्याचार बढ़ता है और देवता तथा भक्त भय से व्याकुल हो जाते हैं, तब माँ अपने दिव्य और पराक्रमी स्वरूप से उनकी रक्षा करती हैं। उनके मस्तक पर स्थित घंटा केवल एक आभूषण नहीं माना जाता, बल्कि यह जागृति और शक्ति का प्रतीक है।कहा जाता है कि माँ के घंटे की दिव्य ध्वनि से नकारात्मक शक्तियाँ दूर हो जाती हैं। जहाँ माँ का स्मरण होता है, वहाँ भय टिक नहीं पाता।माँ चंद्रघंटा हमें यह भी सिखाती हैं कि जीवन में केवल कोमल होना ही पर्याप्त नहीं है। जहाँ प्रेम की आवश्यकता हो, वहाँ प्रेम करना चाहिए और जहाँ अन्याय के सामने खड़े होने की आवश्यकता हो, वहाँ साहस के साथ खड़ा होना चाहिए।माँ का स्वरूप इसी संतुलन का संदेश देता है।उनका चेहरा शांत है, लेकिन हाथों में अस्त्र हैं।उनका तेज दुष्ट शक्तियों को भयभीत करने वाला है। वे भक्तों के लिए माँ हैं और अधर्म के विरुद्ध शक्ति का स्वरूप।
3. पूजा विधि और पसंदीदा भोग
- सुबह की शुरुआत: प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और माँ चंद्रघंटा का ध्यान करें।
- पूजा सामग्री: माता को लाल/पीले रंग के पुष्प (विशेषकर कमल या गुलाब), अक्षत, धूप, और दीप अर्पित करें।
- पसंदीदा भोग: माँ चंद्रघंटा को दूध से बनी मिठाइयां या खीर का भोग अत्यंत प्रिय है।
- मंत्र जाप: पूजा के दौरान निम्नलिखित मंत्र का जाप करें:
मंत्र:
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥
4. माँ चंद्रघंटा की पूजा का महत्व
- साहस और वीरता: माँ की कृपा से साधक में निर्भयता और निडरता आती है।
- पापों का नाश: माँ चंद्रघंटा की आराधना से सभी पाप और बाधाएं दूर होती हैं।
- सौम्यता और शांति: माता भक्तों के जीवन में अलौकिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती हैं।
जय माँ चंद्रघंटा!
माता रानी आप सभी पर अपनी कृपा और आशीर्वाद बनाए रखें।

